राष्ट्रवीर दुर्गादास राठौर

                                        हमारे आदर्श –    

                                                ‘‘राष्ट्रवीर दुर्गादास राठौर‘’

 

‘‘ऐह माता पूत एसा जिन जेसा दुर्गा दास, बंद मूरद्रा राखेओ बिन थम्बा आकाश’’

– लोकगाथा

 

–             राजस्थान के पूर्व राज्य मारवाड़ का इतिहास साहस, बलिदान और धैर्य की असंख्य कथाओं से परिपूर्ण है। निर्भीक धैर्य की एक विशेष रूप से मर्मस्पर्षी कथा वीर दुर्गादास की है, जिन्हें जेम्स टॉड ने अपनी कविताओं में राठौरों का ‘‘यूलीसेस‘‘ कहा है।

मारवाड़ के पूर्व शासक राठौर वंश थे, जो अपने आप को भगवान राम का वंशज मानते थे। मारवाड़ राज्य की नींव 1212 ईसवी में पड़ी थी, जब कन्नौज के राजा जयचंद के पोतों, सियाजी और सैतराम ने लूनी नदी के बालू के टीलों के आस-पास के क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की।

जोधपुर राज्य के संस्थापक और राठौर राज्य के प्रमुख वास्तुविद् राव जोधा के तेईस छोटे भाई थे। दुर्गादास राठौर उनके भाइयों में से एक के वंशज थे।

दुर्गादास का जन्म जोधपुर के निकट स्थित एक ग्राम साल्वा में 13 अगस्त 1638 को हुआ था। उनके पिता असकरन कारनोट को महाराजा जसवंत सिंह-प्रथम के दरबार में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था, लेकिन उन्हें अपने पुत्र से विशेष लगाव नहीं था, जिसने अपने जीवन के आरंभिक वर्ष अपनी मां के साथ ग्राम लुनवा में व्यतीत किए।

एक घटना में दुर्गादास ने एक चरवाहे को मार दिया, क्योंकि उसने जोधपुर किले के बारे में अशोभनीय शब्दों का प्रयोग किया था, जिसके कारण उन्हें जसवंत सिंह-प्रथम ने अपने दरबार में बुलाया। दुर्गादास ने अपने बचाव में जोशीले शब्दों का प्रयोग करते हुए, महाराजा को प्रभावित कर दिया। उस दिन राजा ने भविष्यवाणी की कि ‘‘यह बालक बद्तर कठिनाइयों और गंभीर विपत्तियों में भी शाही सत्ता के प्रति निष्ठावान रहेगा।‘‘ उन्होंने तुरन्त ही दुर्गादास को अपनी सेवा में ले लिया।

मुगल तख्त के लिये उत्तराधिकार की लड़ाई में जोधपुर के महाराजा ने औरंगजेब के विरूद्ध, दारा शिकोह की सहायता की थी। दुर्गादास ने औरंगजेब की सेना के विरूद्ध 1658 के धारमात के युद्ध में अपना कौशल प्रदर्षित किया।

सम्राट बनने के पश्चात् औरंगजेब ने मारवाड़ के महाराजा को अफगानिस्तान के कबीला समुदायों का दमन करने के अभियान के प्रमुख के रूप में सुदूर उत्तर-पश्चिम भेजा। बीमार महाराजा का 1678 में काबुल के निकट जमरूद में निधन हो गया। महाराजा के, बिना किसी उत्तराधिकारी के, निधन होने से मारवाड़ के शाही सिंहासन के लिये उत्तराधिकार की समस्या उत्पन्न हो गई। औरंगजेब ने व्यग्रता से इस अवसर का लाभ उठाते हुए जनवरी, 1679 में अपने कुशलतम सेनापतियों में से एक को मारवाड़ को अपने अधीन करने के लिये भेजा। उसने जसवंत सिंह और उसके सम्बन्धियों की सम्पत्तियों को जब्त कर लिया  और महलों और किलों के कला-वस्तुओं के भण्डार को दिल्ली ले जाया गया, किन्तु एक माह के भीतर, फरवरी 1679 में जसवंतसिंह की विधवा ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसने आगे चलकरऔरंगजेब के मंसूबों पर पानी फेर दिया।

दुर्गादास तथा अन्य दरबारियों ने बालक, अजीत को मारवाड़ का नया महाराजा नियुक्त कर दिया। औरंगजेब ने इसे राजद्रोह घोषित किया और दुर्गादास को, ‘‘मारवाड़ के वैध शासक‘‘ (बालक अजीत) को साथ लेकर आने के लिये आमंत्रित करते हुए एक कपटपूर्ण पत्र लिखा।

बालक महाराजा अजीतसिंह को शाही दरबार में ले जाते समय दुर्गादास को औरंगजेब द्वारा  बच्चे की हत्या करने या मुसलमान बनाने की भनक लग गई। दुर्गादास तत्परता से भाग निकले और बालक अजीत को भी ‘‘मिठाई की टोकरी में छिपाकर‘‘ अपने साथ ले गये। उन्होंने बालक अजीत को सिरोही में एक ब्राह्मण महिला की देखरेख में सौंप दिया जहां वह आठ वर्ष की आयु तक पूर्ण रूप से गुमनामी में रहा। औरंगजेब की इस साजिश ने राठौरों को और उत्तेजित और कुपित किया।

राठौरों और मुगल साम्राज्य से युद्ध का और मारवाड़ को मुगलों के शासन से मुक्त कराने की दुर्गादास के तीस वर्ष के संघर्ष का सूत्रपात यहां से ही हुआ। दुर्गादास राजनीति में चतुर थे ही, उन्होंने अनेक कूटनीतिक संधियां कीं जिसमें उन्होंने एक महत्वपूर्ण संधि औरंगजेब के पुत्र अकबर के साथ की, तथापि, उन्हें अपने सीमित संसाधनों की पूर्ण जानकारी थी इसलिये वे दक्षिण की ओर चले गए। वहां उन्होंने मराठों के साथ मिलकर औरंगजेब के विरुद्ध कई लडा़इयाँ लड़ीं।

दक्षिण में छः वर्ष व्यतीत करने के पश्चात् दुर्गादास ‘‘मुगल साम्राज्य के ताबूत में अंतिम कील ठोक़ने‘‘ के अपने दृढ़ इरादे के साथ 1687 में मारवाड़ लौटे। 1703 से 1707 तक उन्होंने मारवाड़ में गुरिल्ला युद्ध का नेतृत्व इस कुशलता के साथ किया कि मुगल सेनापति ‘‘उन्हें चौथ (भेंट) देकर उनसे सुरक्षा की मांग‘‘ करने लगे। दुश्मन के हमले से हर पल वे चौकन्ना रहते थे। इसकी झलक निम्न पंक्तियों से मिलती है –

‘‘आठ पहर चैंसठ घड़ी, घुड़ले ऊपर वास,

                                                शैल अणी तू सेक तो बाटी दुर्गादास‘‘

अर्थात घौड़े पर बैठे ही भाले की नोक से बाटियां सेककर वे अपनी भूंख मिटाते थे।

इस वीर राठौर के प्रयास तब रंग लाए जब 1707 में दक्षिण में औरंगजेब का निधन हो गया और दुर्गादास ने राजकुमार अजीत के साथ मिलकर मुगलों को साम्भर के युद्ध में पराजित कर दिया तथा जोधपुर के अपने पैतृक किले पर पुनः अधिकार जमा लिया। तत्पश्चात् दिल्ली के नए सम्राट बहादुरशाह ने जून 1710 में जोधपुर पर अजीत की प्रभुसत्ता को मान्यता प्रदान की।

अदम्य साहसी दुर्गादास ने जो स्वप्न संजोया था, वह अंततः साकार कर दिखाया। उनका प्रिय मारवाड़ मुगलों की बेड़ियों से स्वतंत्र हो गया। उन्होंने आतंकवाद को जड़-मूल से नष्ट किया। टॉड के शब्दों में ‘‘जितना बुद्धिमान, उतना ही बहादुर यह राजपूत अपने देश का मुक्तिदाता था‘‘।  कहावत है-

           ‘‘ढंबकढंबक ढोल बाजे, दैदै ठौर नंगारा की।

                        आसे घर दुर्गा होतो सुन्नत होती सारा की।।‘‘

यानी दुर्गादास का अवतरण नहीं होता तो भारत इस्लाम राज्य बना हुआ होता। इसीलिये उन्हें ‘राष्ट्रवीर‘ की उपाधि से नवाजा गया है।

30-32 वर्ष के लम्बे संघर्ष में जहां मुगल साम्राज्य राठौरों पर भारी पड़ा, राठौर समर्पित नहीं हुए। उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बजाय अपनी पहचान छिपाने के लिये अपना पेशा बदला और मुगल साम्राज्य की सीमा के बाहर आश्रय लिया और अपने प्राणों की रक्षा की।

दुर्गादास ने औरंगजेब की लाड़ली पोती का लालन-पालन भी इस्लामिक परम्परा और रीति-रिवाज के किया था इसलिये इन्हें महान धर्मनिरपेक्ष इतिहास पुरूष के रूप में भी याद किया जाता है। आतंकवाद के माहौल में आन-बान-शान से जीने के लिये दुर्गादास का जीवन, आज भी निर्णायक सूत्र है और महान प्रेरणा है। वे निःस्वार्थ राज भक्ति और सेवा भाव की प्रतिमूर्ति थे, किन्तु अपने परिजनों के बलिदान के मूल्य पर, निःस्वार्थ भाव से जिस दुर्गादास ने राजभक्ति के प्रति बफादारी निभाते हुए अजीतसिंह के प्राणों की सदैव रक्षा की, उसे पाला-पोसा और सम्राट बनाया, वैमनष्य के चलते उसी अजीतसिंह ने सिंहासनारूढ़ होते ही दुर्गादास को अपनेराज्य से निष्काषन का हुकुम दिया, किन्तु दुर्गादास ने अपने सिद्धांतों से समझौता न करते हुए, तत्काल उनके हुकुम का पालन किया और जीवन के अंतिम क्षण महाकाल की उपासना में बिताना तय किया तथा उज्जैन को अपनी शरण स्थली बनाया। 22 नवम्बर 1718 को वे स्वर्ग सिधारे। उनकी स्मृति में पवित्र क्षिप्रा तट पर उनकी समाधि/छत्री भी स्थित है।

‘‘शतशत नमन’’ ऐसे राष्ट्रवीर को जो भारत की आन पर सब कुछ लुटाता रहा,

अ0भा0रा0क्ष0 महासभा के तत्कालीन अध्यक्ष सेठ मान0 श्री दुलीचंदजी राठौर (समाज रत्न) की अध्यक्षता में जुलाई 1978 में ग्वालियर में आयोजित सम्मेलन में प्रतिवर्ष उनकी जयंती मनाने और प्रतिमाऐं स्थापित करने का संकल्प लिया गया जो राष्ट्रवीर के प्रति सच्ची और भावभीनी आत्मीय श्रद्धांजलि थी। आज देश के तहसील मुख्यालय तक जयंती उत्साह औेर उल्लास के साथ मनाई जाती है और उनकी प्रतिमाओं की स्थापना कई शहर और कस्बों में हुई है। अभी तक म.प्र. में जबलपुर, भोपाल, शिवपुरी, भिण्ड, इन्दौर, ग्वालियर एवं उ.प्र. में फिरोजाबाद और आगरा में प्रतिमाऐं स्थापित हो चुकीं हैं। ये राठौर संस्कृति की पहचान का मील के पत्थर हैं। इंदौर में राष्ट्रवीर की प्रतिमा की स्थापना श्रीमती मालती डागौर और ग्वालियर में लम्बे अन्तराल के बाद अगस्त 2009 में, अखिल भारतीय राठौर क्षत्रिय महासभा के संरक्षक श्री बाबूलाल जमुनादास जी राठौर के अथक प्रयासों से राष्ट्रवीर की प्रतिमा स्थापित हो पाई। इसका श्रेय, राष्ट्रवीर दुर्गादास राठौर स्मृति संस्था जिला ग्वालियर को है। निःसंदेह दुर्गादास के आभा मण्डल में ही, भूले-भटके राठौर समाज को उसकी असली पहचान मिली और उसका सामाजिक स्तर ऊंचा उठा। उनके आलोक में ही समाज प्रकाशित हुआ है।

डाक टिकिट एवं सिक्के – राष्ट्रवीर की यादों को चिरस्थायी बनाने के लिये भारत सरकार के द्वारा सन् 1988 में डाक टिकिट एवं 25 अगस्त 2003 को सिक्के जारी किये गये हैं।